Saturday, March 14, 2009

जीत लिखूं या हार लिखूं

कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ
या दिल का सारा प्यार लिखूँ

कुछ अपनों के ज़ज़बात लिखूँ या सपनों की सौगात लिखूँ
मैं खिलता सूरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ

वो डूबते सूरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ
वो पल में बीते साल लिखूँ या सदियों लम्बी रात लिखूँ

मैं तुमको अपने पास लिखूँ या दूरी का अहसास लिखूँ
मैं अंधे के दिन मैं झाँकूं या आँखों की मैं रात लिखूँ

मीरा की पायल को सुन लूं या गौतम की मुस्कान लिखूँ
बचपन में बच्चों से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूँ

सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का विस्तार लिखूँ
वो पहली -पहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ

सावन कि बारिश में भीगूँ या आंखों की बरसात लिखूँ
गीता का अर्जुन हो जाऊं या लंका रावण राम लिखूँ

मैं हिन्दू मुस्लिम हो जाऊं या बेबस इन्सान लिखूँ
मैं एक ही मजहब को जी लूं या मजहब की आंखें चार लिखूँ

कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ
या दिल का सारा प्यार लिखूँ

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