मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम,
जुए के पत्ते सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नयी राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।
अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना –
तब और भी बड़े पैमाने पर
मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
एक बार और
शक्ति आज़माने को
धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
मचल रही होंगी ।
एक और अवसर की प्रतीक्षा में
मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।
ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
ये मुझको उकसाते हैं ।
पिण्डलियों की उभरी हुई नसें
मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
क़सम देती हैं ।
कुछ हो अब, तय है –
मुझको आशंकाओं पर क़ाबू पाना है,
पत्थरों के सीने में
प्रतिध्वनि जगाते हुए
परिचित उन राहों में एक बार
विजय-गीत गाते हुए जाना है –
जिनमें मैं हार चुका हूँ ।
मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
Hi Friends, these are not my poems I've received through mails and i just want share them with all of you.
Saturday, June 20, 2009
Ek Anurodh
Raaste alag hon agar
Raahen milti na hon kahin
saath gar chhote kabhi to
aas na chhodna
yaadon mein basaana mujhe
dil mein jagah dena
bas itna hi anurodh
Jaise mile the ham yahin
phir waise hi milein
yeh ummeed rakhna sada
meri tarah.... meri tarah
tum bhi kabhi
yaadon ke panne kholna
dhool si bikhri ho agar
to haath se hi jhaadna
aur phoonk tum na maarna
ke shabd dhundhle na paden
jo kuch likhe hon pyaar se
Yaad tum rakhna mujhe bas
vyastata jitni bhi ho
ek pal ko sochna yeh
duniya mein koyi aisa bhi hai
jo bas tumhaari hi khushi mein
khush bhi rehta hai..
sukhi bhi...
Doston mat bhoolna
Mere doston mat bhoolna...
Raahen milti na hon kahin
saath gar chhote kabhi to
aas na chhodna
yaadon mein basaana mujhe
dil mein jagah dena
bas itna hi anurodh
Jaise mile the ham yahin
phir waise hi milein
yeh ummeed rakhna sada
meri tarah.... meri tarah
tum bhi kabhi
yaadon ke panne kholna
dhool si bikhri ho agar
to haath se hi jhaadna
aur phoonk tum na maarna
ke shabd dhundhle na paden
jo kuch likhe hon pyaar se
Yaad tum rakhna mujhe bas
vyastata jitni bhi ho
ek pal ko sochna yeh
duniya mein koyi aisa bhi hai
jo bas tumhaari hi khushi mein
khush bhi rehta hai..
sukhi bhi...
Doston mat bhoolna
Mere doston mat bhoolna...
Thursday, June 18, 2009
हक दो
फूल को हक दो, वह हवा को प्यार करे,
ओस, धूप, रंगों से जितना भर सके, भरे,
सिहरे, कांपे, उभरे,
और कभी किसी एक अंखुए की आहट पर
पंखुडी-पंखुडी सारी आयु नाप कर दे दे-
किसी एक अनदेखे-अनजाने क्षण को
नए फूलों के लिए!
गंध को हक दो वह उडे, बहे, घिरे, झरे, मिट जाए,
नई गंध के लिए!
बादल को हक दो- वह हर नन्हे पौधे को छांह दे, दुलारे,
फिर रेशे-रेशे में हल्की सुरधनु की पत्तियां लगा दे,
फिर कहीं भी, कहीं भी, गिरे, बरसे, घहरे, टूटे-
चुक जाए-
नए बादल के लिए!
डगर को हक दो- वह, कहीं भी, कहीं भी, किसी
वन, पर्वत, खेत, गली-गांव-चौहटे जाकर-
सौंप दे थकन अपनी,
बांहे अपनी-
नई डगर के लिए!
लहर को हक दो- वह कभी संग पुरवा के,
कभी साथ पछुवा के-
इस तट पर भी आए- उस तट पर भी जाए,
और किसी रेती पर सिर रख सो जाए
नई लहर के लिए!
व्यथा को हक दो- वह भी अपने दो नन्हे
कटे हुए डैनों पर,
आने वाले पावन भोर की किरन पहली
झेल कर बिखर जाए,
झर जाए-
नई व्यथा के लिए!
माटी को हक दो- वह भीजे, सरसे, फूटे, अंखुआए,
इन मेडों से लेकर उन मेडों तक छाए,
और कभी न हारे,
(यदि हारे)
तब भी उसके माथे पर हिले,
और हिले,
और उठती ही जाए-
यह दूब की पताका-
नए मानव के लिए!
ओस, धूप, रंगों से जितना भर सके, भरे,
सिहरे, कांपे, उभरे,
और कभी किसी एक अंखुए की आहट पर
पंखुडी-पंखुडी सारी आयु नाप कर दे दे-
किसी एक अनदेखे-अनजाने क्षण को
नए फूलों के लिए!
गंध को हक दो वह उडे, बहे, घिरे, झरे, मिट जाए,
नई गंध के लिए!
बादल को हक दो- वह हर नन्हे पौधे को छांह दे, दुलारे,
फिर रेशे-रेशे में हल्की सुरधनु की पत्तियां लगा दे,
फिर कहीं भी, कहीं भी, गिरे, बरसे, घहरे, टूटे-
चुक जाए-
नए बादल के लिए!
डगर को हक दो- वह, कहीं भी, कहीं भी, किसी
वन, पर्वत, खेत, गली-गांव-चौहटे जाकर-
सौंप दे थकन अपनी,
बांहे अपनी-
नई डगर के लिए!
लहर को हक दो- वह कभी संग पुरवा के,
कभी साथ पछुवा के-
इस तट पर भी आए- उस तट पर भी जाए,
और किसी रेती पर सिर रख सो जाए
नई लहर के लिए!
व्यथा को हक दो- वह भी अपने दो नन्हे
कटे हुए डैनों पर,
आने वाले पावन भोर की किरन पहली
झेल कर बिखर जाए,
झर जाए-
नई व्यथा के लिए!
माटी को हक दो- वह भीजे, सरसे, फूटे, अंखुआए,
इन मेडों से लेकर उन मेडों तक छाए,
और कभी न हारे,
(यदि हारे)
तब भी उसके माथे पर हिले,
और हिले,
और उठती ही जाए-
यह दूब की पताका-
नए मानव के लिए!
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर
मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वो
आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर
बेदर्द तू सुने ना सुने ले दर्द-ए-दिल
रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर
तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ "ज़फ़र" है मुक़द्दर कहे बग़ैर !!
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर
मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वो
आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर
बेदर्द तू सुने ना सुने ले दर्द-ए-दिल
रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर
तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ "ज़फ़र" है मुक़द्दर कहे बग़ैर !!
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झू�¤ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झू�¤ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
Tuesday, June 16, 2009
Kyun tu acha lagta he

Kyun tu acha lagta he waqt mila tu sochain gaye
Tujh main kia kia dekha he waqt mila tu sochain gaye
Abhi tu uljhe raastay ki gird pari he ankhoon main
Kiss raastay pe jana he waqt mila tu sochain gaye
Abhi tu gham-e-shiddat se khushk hue hain ansoo bhi
Kiss ki yaad main roona he waqt mila tu sochain gaye
Hum ne uss ko likha tha kuch milne ki tadbeer karoo
Uss ne likh kar bheja he waqt mila tu sochain gaye
Abhi tu zinda rahne ka ik bahana he tu bhi
Kiss ki khatir marna he waqt mila tu sochain gaye
Yaa tu apne dill ki mano yaa phir dunya waloon ki
Mashwara uss ka acha he waqt mila tu sochain gaye
Suno ay chand say sathi
Suno ay chand say sathi......
abhi tum keh rahay thay na.......
tumhain mujh say mohabbat ho nahin sakti........
chalo maana k yeh sach hai......
magar ay chand say sathi mujhay itna batao tum........
k jab mausam badaltay hain....
gulon main rang bhartay hain.........
to phir kiyu'n muztarib ho ker.......
akelay pan say ghabra kr........
hawa ko raz detay ho......
mujhay aawaz detay ho.......
suno ay chand say sathi.....
tumharay samnay koi mera jab naam leta hai.......
to phir kiun chonk jatay ho..........
chalo maana tumhain mujh say mohabbat ho nahin sakti......
magar itna samajh lo tum....
jahan chahat chhupa'o gay.....
wahan nafrat k honay ka koi imkaan nahin hota......
mera daawa hai......
chahat main jahan nafrat nahin hoti.......
wahan aksar yeh dekha hai.....
agar kuch waqt kat jaye....
samay ki dhool cHhat jaye....
to wehshat bhaag jati hai.....
Mohabbat jaag jati hai !!!!
abhi tum keh rahay thay na.......
tumhain mujh say mohabbat ho nahin sakti........
chalo maana k yeh sach hai......
magar ay chand say sathi mujhay itna batao tum........
k jab mausam badaltay hain....
gulon main rang bhartay hain.........
to phir kiyu'n muztarib ho ker.......
akelay pan say ghabra kr........
hawa ko raz detay ho......
mujhay aawaz detay ho.......
suno ay chand say sathi.....
tumharay samnay koi mera jab naam leta hai.......
to phir kiun chonk jatay ho..........
chalo maana tumhain mujh say mohabbat ho nahin sakti......
magar itna samajh lo tum....
jahan chahat chhupa'o gay.....
wahan nafrat k honay ka koi imkaan nahin hota......
mera daawa hai......
chahat main jahan nafrat nahin hoti.......
wahan aksar yeh dekha hai.....
agar kuch waqt kat jaye....
samay ki dhool cHhat jaye....
to wehshat bhaag jati hai.....
Mohabbat jaag jati hai !!!!
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